Tuesday, 4 June 2013

----मंदिरों की दीवारों पर क्यों बनाई गई सेक्स करती मूर्तियां?---



खजुराहो के मंदिर शिल्प कला और खास तौर पर मंदिर की दीवारों पर बनी मैथुन यानी सेक्स में रत मूर्तियों के कारण विश्व प्रसिद्घ है। खजुराहो के अतिरिक्त कोणार्क मंदिर और पुरी के मंदिरों पर भी इस तरह की मूर्तियों को उकेरा गया है। बिहार के हाजीपुर में स्थित नेपाली छावनी शिव मंदिर ऐसा ही मंदिर है जहां की दीवारों पर मैथुन मूर्तियां बनी हुई हैं

मंदिर अध्यात्म और ईश्वर को प्राप्त करने का स्थान है। जबकि सेक्स को संसारिकता, भोग और अधोगति प्रदान करने वाला माना गया है। ऐसे में मंदिर की दीवारों पर ऐसी मूर्तियों को देखकर हर व्यक्ति के मन में यह सवाल उठाना स्वभाविक है कि मंदिर की दीवारों पर ऐसी मूर्तियां क्यों बनायी गई हैं।

'तापी धर्मराव' ने इस प्रश्न का उत्तर देवालयों पर मिथुन मूर्तियां क्यों? नामक अपनी पुस्तक में दिया है। इनके अनुसार प्राचीन काल में सेक्स पाप कर्म नहीं माना जाता था यह सृष्टि के विकास में योगदान माना जाता था। लोग छुपकर सेक्स करने के बजाय मंदिर में ईश्वर के सामने सेक्स करते थे। माना जाता था कि ऐसा करने से पुण्य की प्राप्ति होती थी।

प्राचीन समय में देवी-देवताओं की मूर्तियां नहीं होती थी उस समय लिंग और योनी की पूजा होती थी। इसका कारण यह था कि लोग यह मानते थे कि संसार की उत्पत्ति पुरूष और प्रकृति के मिलन से हुआ है।

पुरूष के प्रतीक के रूप में लिंग की और प्रकृति के रूप में योनी की पूजा होती थी।

देवी-देवताओं की मूर्तियों के अस्तित्व में आने पर इस रूप में इनकी पूजा होने लगी। ऐसे समय में मंदिरों पर सेक्स करती हुई मूर्तियों को दर्शाने का उद्देश्य यह था कि लोग यह जान सकें कि संसार की वास्तविकता और अस्तित्व पुरूष और प्रकृति के मेल से है।

नारद पुराण में कथा है कि विवाह से मना करने पर नारद को ब्रह्मा जी से शाप मिला। यानी उन दिनों विवाह और सेक्स को धार्मिक दृष्टि से पुण्य का काम काम माना जाता था। मंदिरों पर सेक्स करती हुई मूर्तियों के दिखाने की वजह पर एक अन्य मत यह भी है कि संसार मैथुनमय है यानी संसार वासना और सेक्स में डूबा हुआ है।

इसलिए इसे अच्छी तरह देख लो और तृप्त हो जाओ। उसी प्रकार जैसे भर पेट मिठाई खाने के बाद कोई मिठाई खाने का आग्रह करे तो आप मना कर दें। जब मन वासना और काम भावना से तृप्त हो जाए तब मंदिर में प्रवेश करो ताकि उस समय भोग और काम की भावना मन को दूषित नहीं करे और ईश्वर के प्रति आप पूर्ण समर्पित हो सकें।
----इन मह‌िलाओं को नहीं होता ब्रेस्ट कैंसर---



मां का दूध न सिर्फ बच्चे की सेहत और विकास के लिए फायदेमंद है बल्कि मां का भी ब्लड प्रेशर ठीक रखता है। वेस्टर्न सिडनी यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने यह दावा किया है कि जो महिलाएं अपने बच्चों को लंबे समय तक अपना दूध पिलाती हैं, वे लंबे समय तक हाई ब्लड प्रेशर की मरीज नहीं होती हैं।

शोध के दौरान उन्होंने पाया कि बच्चे को लंबे समय तक दूध पिलाने वाली महिलाएं अमूमन 64 साल की उम्र तक हाई ब्लड प्रेशर का शिकार नहीं होती हैं। इस दौरान शोधकर्ताओं ने 27,785 आस्ट्रेलियाई महिलाओं, जिनकी उम्र 45 वर्ष से अधिक थी, की मेडिकल हिस्ट्री और ब्रेस्ट फीडिंग की जानकारी इकट्ठा की।

डेली मेल में प्रकाशित इस शोध में शोधकर्ता डॉ. जोएन लिंड ने माना कि यह खोज मां और बच्चे, दोनों की सेहत के लिहाज से एक बड़ी उपलब्धि है। महिलाओं को अपने बच्चों को जितना हो सके उतना अपना दूध पिलाना चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि शोध के दौरान 45 से 64 साल की महिलाओं ने अपने जीवन में औसतन करीब छह माह तक बच्चों को अपना दूध पिलाया और एक बच्चे को करीब तीन माह तक अपना दूध पिलाया।

हालांकि शोधकर्ता अभी तक ब्रेस्टफीडिंग और हाई ब्लड प्रेशर के संबंध की ठोस वजह का पता नहीं लगा सके हैं पर उनका मानना है कि ब्रेस्टफीडिंग के दौरान निकलने वाले हार्मोन का संबंध ब्लड प्रेशर से हो सकता है।

गौरतलब है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन महिलाओं को छह महीने तक अपने बच्चे को दूध पिलाने की सलाह देता है।
----पत्नी की ‘‘झूठी’’ शिकायतों के शिकार बने व्यक्ति को अदालत से मिली तलाक की मंजूरी----


नयी दिल्ली। दिल्ली उच्च न्यायालय ने आज अपनी पत्नी की ‘‘झूठी’’ शिकायतों के शिकार बने एक व्यक्ति के तलाक को मंजूरी दे दी। व्यक्ति की पत्नी ने उसके और उसके परिवार वालों के खिलाफ कई शिकायतें दर्ज करायी थीं। अदालत ने कहा कि महिला के कार्रवाईयों से उसका पति मानसिक रूप से प्रताड़ित हुआ।
निचली अदालत द्वारा अपने पति के पक्ष में दिए गए फैसले को चुनौती देते हुए महिला ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी जिसे न्यायमूर्ति प्रदीप नंदराजोग और वी कामेश्वर राव की खंडपीठ ने खारिज कर दिया। खंडपीठ ने परिवार अदालत के फैसले से सहमति जतायी।
खंडपीठ ने कहा, ‘‘हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि संदीप :बदला हुआ नाम: और उसके परिवार वालों के खिलाफ पुलिस के समक्ष और संदीप के कार्यालय में कई गलत शिकायतें दर्ज कराकर महिला ने अपने पति को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया है।
महिला ने अपने पति और उसके परिवार वालों के खिलाफ दहेज की मांग करने, उनकी मांगों को पूरा ना करने पर उसके साथ कू्ररता से पेश आने और अपने पति पर एक सहकर्मी के साथ अवैध संबंध में लिप्त होने के गलत आरोप लगाए थे जिसकी वजह से हिन्दू विवाह अधिनियम के तहत व्यक्ति को तलाक पाने का हक है।’’
अदालत ने अपने फैसले में कहा, ‘‘कोई वैवाहिक विवाद केवल एक कानूनी विवाद नहीं है बल्कि इससे अधिक महत्वपूर्ण रूप से यह एक पारिवारिक और एक सामाजिक समस्या है। कानूनी बारीकियों के दृष्टिकोण से वैवाहिक विवादों को नहीं देखा जाना चाहिए। इसे एक पति और पत्नी के बीच मानवीय स्तर पर एक समस्या के तौर पर देखा जाना चाहिए। पारंपरिक ढर्रे पर न चलकर इस तरह के मामलों को संवेदनशीलता से निपटाया चाहिए।’’
पिछले साल 14 दिसंबर को परिवार अदालत ने व्यक्ति की तलाक की मांग संबंधी याचिका स्वीकार कर ली थी और उसकी पत्नी की विरोधी याचिका खारिज कर दी थी।

अदालत ने महिला द्वारा अपने पति के खिलाफ लगाए गए दहेज के लिए प्रताड़ित करने के आरोप को खारिज करते हुए कहा, ‘‘हमारे पास पर्याप्त सबूत है कि यह शादी दहेज रहित थी।’’
व्यक्ति ने अदालत को बताया था कि उन दोनों ने 22 मार्च, 1997 को अपने माता-पिता को बताए बिना गुप्त रूप से शादी की थी। इसके बाद दोनों ने 26 फरवरी, 1999 को आधिकारिक रूप से शादी की जिसमें केवल लड़की के माता-पिता ही मौजूद थे। व्यक्ति की इस दलील को उच्च न्यायालय ने स्वीकार कर लिया।
भाषा

Saturday, 12 January 2013

----यमुना नदी जो नाला बनकर रह गई है----





दिल्ली का वज़ीराबाद बैराज एक ऐसी जगह है जहाँ पर आपको इस सवाल का जवाब शायद मिल जाएगा.

यही वो जग
ह है जहाँ से नदी दिल्ली मे प्रवेश करती है और इसी जगह पर बना बैराज यमुना को आगे बढ़ने से रोक देता है.

वज़ीराबाद के एक तरफ यमुना का पानी एकदम साफ़ और दूसरी ओर एक दम काला. इसी जगह से नदी का सारा पानी उठा लिया जाता है और जल शोधन संयत्र के लिए भेज दिया जाता है ताकि दिल्ली की जनता को पीने का पानी मिल सके. बस यहीं से इस नदी की बदहाली भी शुरु हो जाती है.

-----नदी की बदहाली-----

उत्तरप्रदेश के टिहरी-गढ़वाल जिले में यमुनोत्री से निकलने वाली यमुना उत्तर प्रदेश के प्रयाग में जा कर गंगा नदी में मिल जाती है.

इस बात को मानने से कोई भी इनकार नही कर सकता कि यमुना भारत की सर्वाधिक प्रदूषित नदियों में से एक है.

जल-पुरुष के नाम से प्रसिद्ध रैमन मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित राजेंद्र सिंह कहते हैं, “ये यमुना नदी नहीं, यमुना नाले की कहानी है. जब दिल्ली में 22 किलोमीटर के सफर में ही 18 नाले मिल जाते हैं तो बाकी जगह का हाल क्या होगा. इसमें सबसे बड़ा योगदान औद्योगिक प्रदूषण का है जो साफ़ हो ही नही रहा.”

----यमुना नदी नहीं, यमुना नाला----

यमुना में प्रदूषण का स्तर खतरनाक है, और दिल्ली से आगे जा कर ये नदी मर जाती है.

विशेषज्ञों का मानना है कि इसकी वजह है औद्योगिक प्रदूषण, बिना उपचार के कारखानों से निकले दूषित पानी को सीधे नदी में गिरा दिया जाना,यमुना किनारे बसी आबादी मल-मूत्र और गंदकी को सीधे नदी मे बहा देती है.

साथ ही धार्मिक वजहों के चलते तमाम मूर्तियों व अन्य सामग्री का नदी में विसर्जन.

लेकिन इनमें सबसे खतरनाक है रासायनिक कचरा.

सिटिजन फोरम फॉर वाटर डेमोक्रेसी के समन्वयक एसए नकवी प्रदूषित होती यमुना की कहानी बताते है.

नकवी कहते हैं, “यमुना एक हजार 29 किलोमीटर का जो सफर तय करती है, उसमें दिल्ली से लेकर चंबल तक का जो सात सौ किलोमीटर का जो सफर है उसमें सबसे ज्यादा प्रदूषण तो दिल्ली, आगरा और मथुरा का है. दिल्ली के वज़ीराबाद बैराज से निकलने के बाद यमुना बद से बदतर होती जाती है. इन जगहों के पानी में ऑक्सीजन तो है ही नही. चंबल पहुंच कर इस नदी को जीवन दान मिलता है और वो फिर से अपने रूप में वापस आती है.”

लेकिन ऐसा नहीं है कि नदी कि हालत सुधारने के लिए प्रयास नहीं किए गए. सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर भी कार्यक्रम चलाए गए पर हालात जस के तस रहे.


-----यमुना ऐक्शन प्लान-----

हेजार्ड सेंटर के डुनू राय का मानना हैं कि यमुना ऐक्शन प्लान के दो चरणों में इतना पैसा बहाने के बाद भी अगर नदी का हाल वही का वही है तो इसका सीधा मतलब ये है कि जो किया गया हैं वो सही नही है.

डुनू राय आगे कहते हैं कि नदी साफ़ रहने के लिए ज़रूरी है कि पानी बहने दिया जाए. हर जगह बांध बना कर उसे रोकने से काम नही चलेगा. दिल्ली के आगे जो बह रहा है वो यमुना है ही नही वो तो मल-जल है. पहले मल- जल को नदी में छोड़ दो और उसके बाद उसका उपचार करते रहो तो नदी कभी साफ़ नही हो सकती.

पिछले साल 2012 के दिसंबर महीने में यमुना की सफाई के मामले में सरकारी एजेंसी के बीच तालमेल की कमी को सुप्रीम कोर्ट ने गंभीरता से लिया और पूछा कि करोड़ों रुपए खर्च होने के बाद भी अभी तक कोई परिणाम क्यों नही निकला.

पर्यावरण विद अनुपम मिश्र कहते हैं कि हिंदुस्तान का जिस तरह का मौसम चक्र है उसमें हर नदी चाहे वो कितनी भी प्रदूषित क्यों न हो, साल में एक बार बाढ़ के वक्त खुद को फिर से साफ़ करके देती है, पर इसके बाद हम फिर से इसे गंदा कर देते है, तो हमें नदी साफ़ करने की बजाय इसे गंदा करना बंद करना पड़ेगा.

यही यमुना संगम में मिलती है. सवाल ये है कि इलाहाबाद के कुंभ में लोग जिस पानी में स्नान कर रहे हैं वो कौन सा और कहाँ का है क्योंकि दिल्ली के वज़ीराबाद के आगे तो यमुना है ही नही वो तो सिर्फ.....

Friday, 14 December 2012

---चांद की सैर कराएगी ये कंपनी!---

---चांद की सैर कराएगी ये कंपनी!---

अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के कुछ पूर्व अधिकारियों ने गोल्डन स्पाइक नाम की कंपनी तैयार की है जो लोगों को चांद की यात्रा पर ले जाएगी---

कंपनी ने दो लोगों को चांद की यात्रा पर ले जाने की क़ीमत 14 अरब रूपए तय की है.

गोल्डन स्पाइक का कहना है कि वो इस काम में पहले से ही मौजूद रॉकेट और कैप्सूल तकनीक का इस्तेमाल करेगी और कार्यक्रम की शुरूआत इस दशक में ही होगी.

चंद सालों पहले स्पेस एक्स नाम की एक कंपनी ने कुछ माल अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन प
हुंचाया था जिसके बाद गोल्डन स्पाइक जैसी दूसरी कंपनियों को लोगों को चांद की यात्रा पर ले जाने का विचार आया.

अमरीका चांद पर पहुंचने वाला दुनियां का पहला मुल्क था.

हालांकि बहुत अधिक क़ीमत और लोगों की कम होती दिलचस्पी ने चंद्रमा से जुड़े कार्यक्रमों को बंद करने पर मजबूर किया है. अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने नासा के एक कार्यक्रम को ये कहते हुए बंद कर दिया कि अमरीका वहां पहले जा चुका है.